دشت ِ هويج ِ شهر ِ من سبز ترين ترانه است

Saturday, May 12, 2007

گُل ِ سُرخ




« گل ِ سُرخ »

صبحي تو شنيده اي سلام ِ گُل ِ سُرخ ؟

يك جرعه چشيده اي ز ِ جام ِ گُل ِ سُرخ ؟

هنگام ِ سپيده از لواسان بگذر

بشنو ز ِ لب ِ غنچه پيام ِ گُل ِ سُرخ

توصيف و ستايش ِ جمال ِ كه كند ؟

تَرتيل و تلاوتت ِ كلام ِ گُل ِ سُرخ

اعجاز ِ طبيعت است در وقت ِ طلوع

زيبائي ِ سجده و قيام ِ گُل ِ سُرخ

هر خار كه در كنار ِ گُل مي رويد

تيغي است كشيده از نيام ِ گُل ِ سُرخ

بشتاب كه شادابي ِ گُل كوتاه است

افسوس به عمر ِ بي دوام ِ گُل ِ سُرخ

اي بلبل ِ عاشق تو سحر خيز نيي

زين رو نرِ سيده اي به كام ِ گُل ِ سُرخ

همراه نسيم ِ صُبحدم « سنجابي »

از باد بگير انتقام ِ گُل ِ سُرخ ؟!

ارديبهشت ِ 86



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